राजनीतिः सुगौली संधि के बहाने

शताब्दी वर्ष के अवसर पर चंपारण की ‘रण’ की याद में जुटेंगे लेखक और पत्रकार
July 8, 2018

अगर कुछ पूंजीपतियों को छोड़ दिया जाए तो मधेश के लोगों कायह सवाल अब भी बना हुआ है कि वे खुद को किस देश का नागरिक कहें। नेपाल का या भारत का।ये लोग नेपाल में रहते हैं और बहुत सारे लोगों को नेपाली नागरिकता भी प्राप्त है, लेकिन पहले भी इनके अधिकार सीमित
थे और नए संविधान में भी इनकी अनदेखी की गई है।

दो सौ साल बाद हम आज एक ऐसी घटना को याद कर रहे हैं जो ऐतिहासिक के साथ-साथ सांस्कृतिक भी है। ऐतिहासिक रणभूमि पर घटी यह एक ऐसी घटना है जिसके जरिए हम युद्ध नहीं बल्कि संधि की बात कर रहे हैं। जी हां, सुगौली संधि। हमने देखा है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की चर्चा में ज्यादातर इतिहासकार 1795 के बाद एक लंबी छलांग लेते हैं और सीधे सिपाही विद्रोह पहुंच जाते हैं। इस बीच हिंदुस्तान में घटी कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है सुगौली संधि। यह कहना ठीक नहीं कि इतिहासकारों ने सुगौली के साथ बेईमानी की है, लेकिन यह कहना गलत न होगा कि ज्यादातर इतिहासकारों ने दो देशों के बीच घटी इस महत्त्वपूर्ण घटना को नजरअंदाज करके अन्याय किया है। दो देश जिनकी सीमारेखा सैकड़ों किलोमीटर तक फैली है और जिसके दोनों तरफ एक जैसे लोग बसते हों उनके बारे में विस्तार से लिखने में क्यों कोताही बरती गई यह समझ से परे है।

मुगलों के जाने के दौर से अंग्रेजों के भारत पर शासन के दौरान तमाम ऐसी घटनाएं हुर्इं जो भौगोलिक दृष्टि से देश के सांस्कृतिक स्वरूप से परिचित कराती हैं। रियासतों के भारतवर्ष के उत्तर में राणा, नेवार और गोरखाओं का राज था। ये राजा भी भारत के मराठा बाजीराव और महाराणा प्रताप की तरह अपने साम्राज्य का विस्तार और हिंदू संस्कृति का विस्तार करते रहे। पहली बार में गोरखाओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी के योद्धाओं को पटखनी दी लेकिन धुन के पक्के गोरों ने 1813 से 1815 तक लगातार लड़ाई कर नेपाल को उनके पुराने इलाके तक सीमित रखा। दो साल चली लड़ाई के बाद 1815 के दिसंबर में यहीं सुगौली के धनही गांव में संधि हुई, और चार मार्च को दोनों साम्राज्यों ने इस संधि को स्वीकार कर लिया।

दो सौ साल बाद भारत-नेपाल के संबंधों को ध्यान में रखते हुए चार-पांच मार्च 2016 को सुगौली संधि समारोह का आयोजन हुआ। इस आयोजन में दोनों देशों के चिंतक, रचनाकार, पत्रकार, इतिहासकार और राजनेता शामिल हुए। दो दिन तक यहां भारत-नेपाल के इतिहास और उनके मौजूदा संबंधों पर विस्तार से चर्चा हुई। हालांकि पहले से तय कार्यक्रम और तमाम प्रशासनिक तैयारियों के बावजूद बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविद ऐन मौके पर क्यों नहीं आए यह कौतूहल का विषय है। परिचर्चा के दौरान दोनों देशों से आए वक्ताओं ने भारत-नेपाल संबंधों पर और उसके इतिहास पर खुल कर बोला।

एक तरफ जहां सभी वक्ताओं ने भारत-नेपाल के संबंधों और नेपाल के मौजूदा भौगोलिक स्वरूप के लिए इस संधि को महत्त्वपूर्ण माना, वहीं मौजूदा परिदृश्य में मधेशी आंदोलन और उसके मुद््दे को विचारणीय बताया। दरअसल, हाल की घटनाओं पर गौर करें तो भारत और नेपाल की चर्चा के दौरान नेपाल के मौजूदा संकट और मधेशी आंदोलन से अछूता नहीं रहा जा सकता, और फिर जब हम चर्चा भारत-नेपाल के बीच हुई संधि की कर रहे हों तब तो बिल्कुल नहीं। हाल के महीनों में नेपाल में संविधान के विरोध में हुए आंदोलन ने देश की अर्थव्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। बंद एसी कमरे में चाहे जितने भाषण दिए जाएं लेकिन जब उन इलाकों के लोगों की परेशानियों पर गौर किया जाता है तो लगता है इससे मुंह मोड़ना नाइंसाफी होगी।

सुगौली संधि के फलस्वरूप जो जगह-जमीन नेपाल को ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1816 में सौंपी उसमें 1857 के बाद बढ़ोतरी कर दी गई। 1857 के विद्रोह के वक्त सुगौली में ब्रिटिश छावनी स्थापित हो चुकी थी और इस छावनी से उठी विद्रोह की आग को दबाने में नेपाल के राजा ने ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था। हालांकि हो सकता है कि वह उनकी तात्कालिक मजबूरी रही होगी, लेकिन ब्रिटिश इंडिया ने इनामस्वरूप जो तराई का इलाका नेपाल को सौंपा उससे नेपाल को लाभ हुआ और भारत के सीमावर्ती इलाके में लोगों को यह बात आज भी कचोटती है। बड़े भाई की भूमिका अदा करने के बाद भी उसे वह सम्मान नहीं मिला। यह कहना गलत न होगा कि इसके पीछे भी ब्रिटिश इंडिया की कुछ अलग सोच रही होगी। सुगौली से बेहतर जल-जमीन देश के कई हिस्सों में कइयों की होगी लेकिन ऐसा इतिहास कितनों का होगा इसमें संदेह है। दिवंगत रचनाकार रमेशचंद्र झा ने तो सुगौली का ऐसा इतिहास लिखा है कि एक-एक कर दृश्य आपके सामने आते हैं।

इस संधि को दो सौ साल हो चुके हैं। इस संधि के बारे में सही जानकारी न देकर एक तरफ जहां इतिहासकारों से गलतियां हुई हैं उससे ज्यादा गलतियां यहां की बाद की पीढ़ी ने कीं, जिन्होंने इस संधि का महत्त्व जानने की कोशिश नहीं की। अगर आप अपनी संस्कृति, अपने धरोहर और अपने इतिहास को जिंदा नहीं रखेंगे तो कोई और उसे तबाह करने में कसर नहीं छोड़ेगा। और इसी का नतीजा है कि नेपाल और भारत के बीच पूरे तराई इलाके में मधेश मुद््दा सुरसा के मुंह की तरह बड़ा होता जा रहा है।

इस समारोह में नेपाल के पूर्व सांसद गोपाल ठाकुर ने बड़ी अहम बात उठाई- नेपाल में अड़तालीस फीसद आबादी मधेशियों की है। इसमें नेपाल के मूल और भारत से गए दोनों तरह के लोग शामिल हैं। यहां की बोली मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका और नेपाली है। पर दिक्कत यह है कि नेपाल के छप्पन लाख लोगों यानी कि मधेशियों को अब तक वहां की नागरिकता नहीं मिल पाई है। जिन्हें नागरिकता मिली भी है, वह किसी काम की नहीं, क्योंकि उन्हें न ही सरकारी नौकरी में जगह मिलती है और न ही संपत्ति में, यानी सिर्फ कहने को वे नेपाली नागरिक हैं। भारत के साथ मधेश का एक अलग संबंधियों वाला और पारिवारिक रिश्ता रहा है। मधेशी शुरू से लेकर अब तक एक ही प्रश्न से जूझते आए हैं कि आखिर वे किस राष्ट्र के नागरिक हैं। और समय के साथ-साथ मधेशियों की पहचान का यह संकट और गहराता गया।

अगर कुछ पूंजीपतियों को छोड़ दिया जाए तो मधेश के लोगों कायह सवाल अब भी बना हुआ है कि वे खुद को किस देश का नागरिक कहें। नेपाल का या भारत का।ये लोग नेपाल में रहते हैं और बहुत सारे लोगों को नेपाली नागरिकता भी प्राप्त है, लेकिन पहले भी इनके अधिकार सीमित थे और नए संविधान में भी इनकी अनदेखी की गई है। वहां की सेना में मधेशी लोगों को जगह नहीं मिलती क्योंकि उनको पिछड़ा और कायर माना जाता है। ऐसे में सीमावर्ती इलाके में होने वाला विरोध भविष्य में भारत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

समारोह के प्रमुख वक्ता विभूति नारायण राय ने कहा कि ‘मधेशी आंदोलन का सबसे दुखद पहलू यह रहा है कि जब-जब उन्होंने अपने नागरिक अधिकारों की बात की है उन्हें भारत के साथ जोड़ दिया गया है। और भारत को भी बड़े भाई की भूमिका अदा करनी होगी, न कि बिग ब्रदर की।’ वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि ‘भारत और नेपाल के बीच रोटी-बेटी का संबंध है। ऐसे में हम उनका साथ देने को तैयार हैं लेकिन उनको अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी क्योंकि हमारा हस्तक्षेप बाहरी हस्तक्षेप कहलाएगा जो दोनों देशों के संबंधों के लिए ठीक नहीं है।’ वहीं नेपाल के मौजूदा सांसद हरिचरण साह ने कहा कि ‘जैसा कि हम सब जानते हैंनेपाल में एंटी-इंडियन होने का अर्थ है सच्चा राष्ट्रवादी होना। यह और बात है कि भारत अब भी यह बात नहीं समझ पाया है और वह पहाड़ियों को ही अपने ज्यादा करीब पाता है।’

मधेशियों पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि ये कभी भी भारत-विरोधी नहीं रहे इसलिए ये सच्चे नेपाली नहीं हो सकते। अब भी जब राज्य विभाजन की बातें की गई हैं तो सबसे पहले यही कहा गया है कि अगर मधेश मजबूत हो गया तो भारत नेपाल में अपना अधिकार जमा लेगा। दरअसल, यह एक निराधार डर है जो नेपाल के ज्यादातर राजनीतिकों के मन में बैठा हुआ है। पर तमाम शोषण और दमन के बीच मधेशियों ने अपनी मेहनत से तराई-भूभाग को देश के सबसे उर्वर क्षेत्र में बदल दिया है। पर जितने भी पहाड़ी शासक रहे, चाहे वह राजा महेंद्र हों, राजा ज्ञानेंद्र या श्री 3 राणा सरकार, सबने शोषण और दमन के बल पर मधेशियों की जमीनें जब्त कीं। एक राजा वीरेंद्र को छोड़, दूसरे किसी शासक ने जनता के दिल में जगह नहीं बनाई। तमाम दुविधाओं के बावजूद मधेशी अपना वजूद नेपाल में ही तलाशते हैं, जहां वे सदियों से रहते आए हैं, अपने अधिकार पाने के लिए संघर्ष करते आए हैं और जिसे दिल से अपना मानते हैं।

हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि कोई भी संधि एकतरफा नहीं होती। जब किसी भी युद्ध का हल नहीं निकलता तो बात संधि पर आकर टिकती है। संधि में दोनों पक्ष बराबर पर होते हैं, अगर कोई पक्ष कमजोर होगा तो दूसरा उस पर काबिज हो जाएगा, संधि नहीं करेगा। ऐसे में यह सोचना ही उद्वेलित करता है कि नेपाल के राजा ने ब्रिटिश इंडिया को क्या जबर्दस्त चुनौती दी होगी। नेपाल के कुछ लोगों का यह मानना कि इस संधि से नेपाल को नुकसान हुआ सरासर गलत है। हमारी नजर में नेपाल को जो सबसे बड़ा लाभ हुआ वह यह कि इस संधि के बाद नेपाल एक संपूर्ण राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ और बाद के दिनों में नेपाल संप्रभु राष्ट्रों की गिनती में शामिल हुआ।

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